आध्यात्मिक कथा - पहले पुरूषार्थ करें
एक आदमी बैलगाड़ी लेकर जा रहा था। मार्ग में एक जगह दलदल आया और बैलगाड़ी उसमें फंस गई। बैलों ने जोर मारा, लेकिन गाड़ी का पहिया कीचड़ में धंसता गया। बैलगाड़ी वाला गाड़ी में बैठा बैलों को तो ललकारता है, किंतु गाड़ी को आगे बढ़ाने में सहारा नहीं देता। तभी देवी का एक मंदिर दिखाई दिया तो गाड़ी वाले ने देवी-मां की गुहार लगाई और गाड़ी को निकाल देने की प्रार्थना की।कुछ देर बाद एक हट्टा-कट्टा आदमी वहां आया। उसने कहा, गाड़ी में बैठने से क्या होगा? आओ, गाड़ी से नीचे उतरो और मेरे साथ गाड़ी को आगे की ओर धक्का लगाओ। बैलगाड़ी वाले ने कहा, मेरे धक्का देने से क्या होगा? गाड़ी खींचने के लिए बैल हैं न? आगंतुक ने कहा, तुम्हें गाड़ी निकालनी है या नहीं। गाड़ी वाले ने कहा, गाड़ी निकालने के लिए ही तो देवी मां से विनती कर रहा हूं। उस व्यक्ति ने कहा, निकालनी है तो जैसा कह रहा हूं, वैसा करो। हारकर गाड़ी वाला नीचे उतरा, पहिये में हाथ लगाकर आगे की ओर धक्का दिया। बैलों को भी सहारा मिला और गाड़ी कीचड़ से निकल गई।
आगंतुक ने गाड़ी वाले को नसीहत देते हुए कहा, जिस काम को हम कर सकते हैं, उसके लिए देवी-देवताओं को बुलाना, उनसे मदद की आशा करना अच्छी बात नहीं है। अपने पुरूषार्थ का प्रयोग करना सीखो। जहां अपनी शक्ति काम न करे, अपर्याप्त सिद्ध हो, वहां देवी-देवता की पुकार करनी चाहिए। पहले पूर्ण पुरुषार्थ करें, फिर ईश्वर से सहायता मांगें, आपको अवश्य सहायता मिलेगी।
सनातन दर्शन और भारतीय संस्कृति में चार प्रकार के पुरुषार्थ बताए गए हैं, जिन्हें पुरुषार्थ चतुष्टय भी कहते हैं:
- धर्म (कर्तव्य, नैतिक मूल्य और सही आचरण)
- अर्थ (धन, समृद्धि और आर्थिक संसाधन)
- काम (प्रेम, सुख, इच्छाएं और मनोवैज्ञानिक तृप्ति)
- मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार)
यः स्याद् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥
सरल शब्दों में: यह श्लोक महाभारत के कर्णपर्व (और शांतिपर्व) से लिया गया है, जिसमें धर्म की वास्तविक और व्यावहारिक परिभाषा दी गई है। धर्म केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड नहीं है, बल्कि समाज में व्यवस्था, न्याय, सदाचार और मानवता को बनाए रखने वाले उत्तम गुणों को अपने जीवन में धारण करना ही सच्चा धर्म है।






